Saturday, February 7, 2026

राहुल गांधी : स्टार प्रचारक से बने मोदी के संकटमोचक || सेल्फ गोल एक्सपर्ट बन गए मोदी की ढाल

 


राहुल गांधी : स्टार प्रचारक से बने मोदी के संकटमोचक || सेल्फ गोल एक्सपर्ट बन गए मोदी की ढाल


भारतीय लोकतंत्र की राजनीति जितनी गंभीर है, उतनी ही विडंबनाओं से भरी भी है। यहाँ कई बार नेता जिस उद्देश्य से कदम उठाते हैं, उसका परिणाम ठीक उल्टा निकल आता है। रणनीति कुछ और होती है, असर कुछ और। पिछले एक दशक में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के संदर्भ में एक तंज बार-बार सुनाई देता रहा है—“वे भाजपा के सबसे बड़े स्टार प्रचारक हैं।” यह वाक्य सुनने में भले ही व्यंग्य लगे, लेकिन हाल की संसदीय घटनाओं ने इसे फिर से प्रासंगिक बना दिया है। संसद के बजट सत्र के दौरान जिस प्रकार मुद्दों का फोकस बदला और सरकार को राहत मिली, उसने यह प्रश्न खड़ा कर दिया कि क्या राहुल गांधी अनजाने में ही नरेंद्र मोदी के लिए संकटमोचक बनते जा रहे हैं?

असंतोष का उबाल और सरकार की मुश्किलें

उस समय देश का राजनीतिक वातावरण भाजपा के लिए बिल्कुल अनुकूल नहीं था। यूजीसी के नए नियमों ने विश्वविद्यालय परिसरों में उथल-पुथल मचा दी थी। छात्र, शोधार्थी और शिक्षक सड़क पर उतर आए थे। प्रदर्शन केवल कुछ महानगरों तक सीमित नहीं थे, बल्कि छोटे शहरों और कस्बों तक फैल चुके थे। सबसे चिंताजनक बात यह थी कि यह आंदोलन जाति या वर्ग की सीमाओं में बँटा हुआ नहीं था। सवर्ण से लेकर दलित, पिछड़े और आदिवासी—सभी वर्गों के छात्र इसमें शामिल थे।

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यही वह स्थिति होती है, जो किसी भी सरकार के लिए सबसे खतरनाक मानी जाती है—जब असंतोष सर्वव्यापी हो जाए और उसके खिलाफ कोई स्पष्ट वैचारिक विभाजन न हो। भाजपा की परेशानी यह भी थी कि उसका पारंपरिक समर्थक युवा वर्ग भी इस बार नाराज दिखाई दे रहा था। जिन युवाओं ने सोशल मीडिया पर भाजपा की विचारधारा को मजबूती दी थी, वही अब सवाल पूछ रहे थे।

सोशल मीडिया, जो भाजपा की ताकत माना जाता था, वहाँ माहौल बदल गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाइव कार्यक्रमों में पहले लाखों लोग जुड़ते थे, लेकिन अब संख्या घटकर सैकड़ों या हजारों में सिमटने लगी। यह गिरावट केवल आँकड़ा नहीं थी, बल्कि संकेत था कि भावनात्मक समर्थन में दरार आ चुकी है।

सरकार दुविधा में थी—नियम वापस ले तो नीति विफल दिखे, लागू रखे तो आंदोलन बढ़े। यह वही स्थिति थी जिसे हिंदी मुहावरे में ‘साँप-छछूंदर’ कहा जाता है।

विपक्ष के लिए सुनहरा मौका

राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में यह समय विपक्ष के लिए स्वर्णिम अवसर था। संसद का बजट सत्र सरकार को घेरने का आदर्श मंच हो सकता था। बेरोजगारी, शिक्षा, युवाओं की नाराजगी—ये सारे मुद्दे विपक्ष के पास थे। राहुल गांधी, जो नेता विपक्ष की भूमिका में थे, उनसे उम्मीद थी कि वे सरकार को कटघरे में खड़ा करेंगे।

लेकिन राजनीति में कभी-कभी सबसे बड़ा नुकसान ‘गलत समय पर गलत मुद्दा’ उठा देने से होता है।

मुद्दा बदला, बहस बदली, सरकार बची

धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलते हुए राहुल गांधी यूजीसी या बजट पर केंद्रित हमला कर सकते थे। लेकिन उन्होंने अप्रत्याशित रूप से सेना प्रमुख मुकुंद नरवणे की एक अप्रकाशित पुस्तक का उल्लेख करते हुए चीन सीमा का मुद्दा उठा दिया। रक्षा मंत्री और प्रधानमंत्री पर आरोप लगाए गए। यह विषय संवेदनशील अवश्य था, किंतु तत्कालीन जनभावना से सीधा जुड़ा हुआ नहीं था।

लोकसभा अध्यक्ष ने संसदीय परंपरा का हवाला देते हुए अप्रकाशित पुस्तक का उल्लेख करने से मना कर दिया। इसके बाद हंगामा शुरू हुआ। कांग्रेस ने इसे बड़ा मुद्दा बना दिया। सदन की कार्यवाही बाधित हुई। मीडिया और सोशल मीडिया पर बहस का केंद्र अचानक बदल गया।

यहीं भाजपा को राहत मिली।

राजनीति में इसे “एजेंडा सेटिंग” कहा जाता है—जो तय करता है कि चर्चा किस विषय पर होगी, वही बहस जीतता है। राहुल गांधी ने अनजाने में सरकार से एजेंडा छीनने के बजाय उसे खुद सौंप दिया।

विवादों की नई श्रृंखला

इसके बाद रवनीत सिंह बिट्टू को ‘गद्दार’ कहे जाने की घटना ने सिख समुदाय में नाराजगी पैदा कर दी। भाजपा ने इसे तुरंत राजनीतिक मुद्दा बनाया। कांग्रेस को सफाई देनी पड़ी।

इसके साथ ही भाजपा ने रणनीतिक जवाबी हमला किया। सांसद निशिकांत दुबे ने इतिहास और पुस्तकों का सहारा लेते हुए नेहरू-गांधी परिवार से जुड़े विवादास्पद प्रसंग उठाए। ‘पुस्तक युद्ध’ शुरू हो गया।

अब बहस यूजीसी से हटकर इतिहास, संस्मरण और निजी जीवन के आरोप-प्रत्यारोप पर आ गई।

पुस्तकों का संदर्भ और उनका सार

इस विवाद में जिन पुस्तकों का उल्लेख हुआ, उनका राजनीतिक महत्व समझना जरूरी है:

‘एडविना एंड नेहरू’ (कैथरीन क्लेमेंट)
यह पुस्तक नेहरू और एडविना माउंटबेटन के निजी संबंधों पर आधारित है। इसमें भारत विभाजन के समय की राजनीतिक और व्यक्तिगत जटिलताओं का वर्णन है। भाजपा ने इसे एडविना -नेहरू के अंतरंग संबंधों और उनकी निर्णय क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगाने के लिए उद्धृत किया।

‘इंडिया रिमेम्बर्ड’ (पामेला माउंटबेटन)
यह संस्मरण सत्ता हस्तांतरण के दौर का प्रत्यक्षदर्शी विवरण है। इसमें नेहरू परिवार के निजी संबंधों और उस दौर की राजनीतिक परिस्थितियों का उल्लेख मिलता है।

‘द रेमिनिसेंस ऑफ नेहरू एरा’ (एम.ओ. मथाई)
नेहरू के निजी सचिव द्वारा लिखी गई इस पुस्तक में नेहरू युग के कई अंदरूनी किस्सों का जिक्र है। इसमें सत्ता के भीतर की राजनीति और व्यक्तिगत संबंधों के विवादास्पद विवरण दिए गए हैं।

‘हिमालयन ब्लंडर’ (ब्रिगेडियर जॉन डालवी)
1962 के भारत-चीन युद्ध की असफलताओं पर आधारित यह पुस्तक राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व की रणनीतिक गलतियों का विश्लेषण करती है। इसमें तत्कालीन सरकार की तैयारी की कमी की आलोचना है।

‘मित्रोखिन आर्काइव’
शीत युद्ध काल के दस्तावेजों पर आधारित यह संग्रह सोवियत प्रभाव और भारतीय राजनीति के संबंधों पर दावे करता है। भाजपा ने इसे कांग्रेस की विदेश नीति पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल किया।

इन पुस्तकों के उद्धरणों ने कांग्रेस को रक्षात्मक बना दिया। परिणामस्वरूप, वह सरकार पर हमला करने के बजाय खुद बचाव करती नजर आई।

राजनीतिक मनोविज्ञान की दृष्टि से

राजनीति केवल तथ्यों की लड़ाई नहीं होती, बल्कि धारणा (perception) की लड़ाई होती है। जनता वही याद रखती है, जो सुर्खियों में रहता है। जब यूजीसी मुद्दा मीडिया से गायब हुआ, तो सरकार पर बना दबाव भी स्वतः कम हो गया।

यह वही सिद्धांत है जिसे चुनावी रणनीतिकार कहते हैं—
“जब विपक्ष अपने मुद्दे छोड़कर आपके मुद्दों पर बहस करने लगे, समझिए आपने आधी लड़ाई जीत ली।”

यही यहाँ हुआ।

निष्कर्ष: विरोध या मदद?

राहुल गांधी की मंशा क्या थी, यह अलग प्रश्न है। लेकिन राजनीति में इरादा नहीं, परिणाम मायने रखता है। परिणाम यह रहा कि:

  • सरकार रक्षात्मक से आक्रामक हुई
  • कांग्रेस आक्रामक से रक्षात्मक हुई
  • छात्र आंदोलन हाशिये पर चला गया
  • मीडिया का फोकस बदल गया

इस दृष्टि से देखें तो राहुल गांधी ने अनजाने में भाजपा को वह राहत दे दी, जिसकी उसे सबसे ज्यादा जरूरत थी।

पहले उन्हें भाजपा का ‘स्टार प्रचारक’ कहा जाता था। अब हालात ऐसे बनते दिखे कि वे ‘संकटमोचक’ की भूमिका में भी नजर आए—ऐसे नेता, जिनकी रणनीति का लाभ अंततः प्रतिद्वंद्वी को मिल जाता है।

राजनीति की यही विडंबना है—कभी-कभी विरोधी ही सबसे बड़ी ढाल बन जाता है।

क्या सचमुच केवल डॉ आंबेडकर संविधान के निर्माता हैं ? जानिए संविधान के असली लेखक को

 






क्या सचमुच केवल डॉ आंबेडकर संविधान के निर्माता हैं ? || संविधान की ड्राफ्ट कमेटी, जिसके अध्यक्ष डॉ आंबेडकर थे, बनने के पहले ही संविधान का मसौदा तो तैयार हो चुका था || कई विद्वानों की मेहनत शामिल है संविधान बनाने में लेकिन आंबेडकर के अलावा शायद ही किसी को लोग जानते हों


भारतीय संविधान की सार्वजनिक स्मृति प्रायः कुछ गिने-चुने महान व्यक्तित्वों तक सीमित रहती है—विशेष रूप से डॉ. भीमराव अंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल। उनके योगदान निस्संदेह केंद्रीय थे, परंतु यह तथ्य अक्सर ओझल हो जाता है कि संविधान निर्माण एक सामूहिक, विचारशील और लंबी प्रक्रिया थी, जिसमें 1946 से 1949 के बीच लगभग 300 सदस्यों ने भाग लिया। इस प्रक्रिया में कई ऐसे लोग थे, जिनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था, पर वे आज अपेक्षाकृत कम पहचाने जाते हैं।

ऐसे ही कम चर्चित संविधान-निर्माताओं, उनकी भूमिकाओं और उनके अनदेखे रह जाने के कारणों का विवेचन हमने किया है—


1. बी. एन. राव — परदे के पीछे के संविधान शिल्पकार

भूमिका और योगदान

  • संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार (1946–1948)।
  • प्रारंभिक संवैधानिक ढाँचा और मसौदा तैयार किया, जो ड्राफ्टिंग कमेटी के गठन से पहले अस्तित्व में आया।
  • विश्व के प्रमुख संविधानों—ब्रिटेन, अमेरिका, आयरलैंड, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया आदि—का तुलनात्मक अध्ययन किया।
  • न्यायिक पुनरावलोकन और मौलिक अधिकारों जैसे विषयों पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश फेलिक्स फ्रैंकफर्टर सहित अंतरराष्ट्रीय विधिवेत्ताओं से परामर्श किया।

क्यों उपेक्षित रहे
बी. एन. राव एक नौकरशाह थे, जननेता नहीं। उन्होंने संविधान सभा में अधिक भाषण नहीं दिए और न ही सार्वजनिक पहचान की आकांक्षा रखी। ड्राफ्टिंग कमेटी के गठन के बाद उनका कार्य सामूहिक प्रक्रिया में समाहित हो गया।


2. अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर — संवैधानिक तर्क और संघवाद

भूमिका और योगदान

  • ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्य और प्रख्यात विधिवेत्ता।
  • संघीय ढाँचे, केंद्र–राज्य संबंधों और न्यायपालिका से संबंधित प्रावधानों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका।
  • एक सशक्त केंद्र के पक्ष में कानूनी और संवैधानिक तर्क प्रस्तुत किए।

क्यों उपेक्षित रहे
डॉ. अंबेडकर ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष और प्रमुख प्रवक्ता थे, इसलिए सार्वजनिक पहचान उन्हें मिली। अय्यर का योगदान तकनीकी और विधिक था, जो लोकप्रिय कथाओं में कम स्थान पाता है।


3. के. एम. मुंशी — सांस्कृतिक निरंतरता के पक्षधर

भूमिका और योगदान

  • मौलिक अधिकारों, विशेषकर धर्म की स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अधिकारों पर गहन हस्तक्षेप।
  • अनुच्छेद 44 (समान नागरिक संहिता) को नीति-निर्देशक तत्व के रूप में शामिल कराने में भूमिका।
  • आधुनिक संविधान में भारत की सभ्यतागत पहचान को बनाए रखने के पक्षधर।

क्यों उपेक्षित रहे
मुंशी को अधिकतर एक साहित्यकार, स्वतंत्रता सेनानी या शिक्षाविद् के रूप में याद किया जाता है, न कि एक संवैधानिक विचारक के रूप में। बाद के राजनीतिक विवादों ने भी उनके संतुलित विचारों को ढक दिया।


4. दक्षायणी वेलायुधन — सामाजिक न्याय की नैतिक आवाज़

भूमिका और योगदान

  • संविधान सभा की एकमात्र दलित महिला सदस्य
  • बार-बार यह रेखांकित किया कि सामाजिक और आर्थिक समानता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता अधूरी है।
  • अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव के विरुद्ध सशक्त, अनुभव-आधारित वक्तव्य दिए।

क्यों उपेक्षित रहीं
वे किसी प्रमुख समिति में पद पर नहीं थीं और न ही सत्ता-केन्द्रित राजनीतिक समूहों से जुड़ी थीं। इतिहास लेखन में प्रायः संस्थागत सत्ता को प्राथमिकता दी गई, नैतिक हस्तक्षेपों को नहीं।


5. हंसा मेहता — संवैधानिक समानता की भाषा

भूमिका और योगदान

  • संविधान में लैंगिक-तटस्थ भाषा के लिए संघर्ष—“पुरुष” के बजाय “नागरिक” शब्द के प्रयोग पर बल।
  • अनुच्छेद 14–16 (समानता और भेदभाव निषेध) के स्वरूप पर प्रभाव।
  • बाद में संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधित्व और मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के निर्माण में योगदान।

क्यों उपेक्षित रहीं
महिला योगदान को प्रायः सामूहिक रूप में देखा गया, व्यक्तिगत संवैधानिक हस्तक्षेपों को कम महत्व मिला। संविधान के अध्ययन में लैंगिक दृष्टि लंबे समय तक गौण रही।


6. एन. गोपालस्वामी अय्यंगार — व्यावहारिक राष्ट्र-निर्माण

भूमिका और योगदान

  • सीमावर्ती और संवेदनशील क्षेत्रों के प्रशासन से जुड़े प्रावधानों के प्रारूप में भूमिका।
  • अनुच्छेद 370 (मूल स्वरूप) के निर्माण में प्रमुख भूमिका।
  • जम्मू-कश्मीर के प्रशासनिक अनुभव से यथार्थवादी दृष्टिकोण।

क्यों उपेक्षित रहे
अनुच्छेद 370 पर बाद के राजनीतिक विवादों ने उनके मूल संवैधानिक तर्क और संदर्भ को पीछे धकेल दिया।


इन योगदानकर्ताओं के उपेक्षित रहने के संरचनात्मक संक्षिप्त कारण

  1. नायक-केंद्रित इतिहास लेखन
  2. तकनीकी और समिति-आधारित कार्य की कम दृश्यता
  3. संविधान सभा की बहसों की जटिलता और विशालता
  4. स्वतंत्रता के बाद की राजनीति द्वारा स्मृति का चयन
  5. जाति, लिंग और वर्ग से जुड़ी ऐतिहासिक असमानताएँ

समापन विचार

भारतीय संविधान कुछ महान व्यक्तियों की रचना मात्र नहीं है, बल्कि यह संवाद, असहमति, विविधता और समझौते से गढ़ा गया एक सामूहिक लोकतांत्रिक दस्तावेज़ है। इन कम चर्चित योगदानकर्ताओं को याद करना डॉ. अंबेडकर या अन्य केंद्रीय नेताओं के महत्व को कम नहीं करता, बल्कि संविधान की गहराई और व्यापकता को और स्पष्ट करता है।

देखिये या सुनिए इस विडियो में -

केवल आंबेडकर नहीं, कौन हैं संविधान के निर्माता | भारत का संविधान कैसे बना?


गणतंत्र दिवस परेड से जुड़ी कुछ चौंकाने वाली और कम-ज्ञात जानकारियाँ || परंपराएँ, मुख्य अतिथि, और समय के साथ हुए परिवर्तन ||

 


गणतंत्र दिवस परेड से जुड़ी कुछ चौंकाने वाली और कम-ज्ञात जानकारियाँ || परंपराएँ, मुख्य अतिथि, और समय के साथ हुए परिवर्तन ||


1. परेड हमेशा कर्तव्य पथ (राजपथ) पर नहीं होती थी

  • 1950 से 1954 के बीच शुरुआती गणतंत्र दिवस परेड इरविन स्टेडियम (वर्तमान राष्ट्रीय स्टेडियम), किंग्सवे (राजपथ), लाल किला और रामलीला मैदान जैसे विभिन्न स्थलों पर आयोजित हुईं।
  • राष्ट्रपति भवन से इंडिया गेट तक की आज की प्रतिष्ठित परेड-मार्ग परंपरा 1955 में जाकर स्थिर हुई।
  • इसका प्रतीकात्मक अर्थ था—औपनिवेशिक समारोह-भूगोल से हटकर, राष्ट्रपति (राष्ट्र प्रमुख) और जनता के बीच प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करना।

स्रोत: रक्षा मंत्रालय प्रकाशन; द हिंदू, टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे अख़बारों के अभिलेख


2. पहला गणतंत्र दिवस अपेक्षाकृत सादा था

  • 26 जनवरी 1950 को आज जैसी भव्य सैन्य शक्ति-प्रदर्शन नहीं थी।
  • मुख्य केंद्र था—डॉ. राजेंद्र प्रसाद का राष्ट्रपति पद की शपथ ग्रहण
  • सांस्कृतिक झांकियाँ, फ्लाईपास्ट और विस्तृत प्रस्तुतियाँ 1960 के दशक के बाद धीरे-धीरे बढ़ीं।

यह विकास भारत के आत्मविश्वास के बढ़ने—सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्तर पर—का संकेत था।


3. मुख्य अतिथि की परंपरा रणनीतिक सोच से शुरू हुई

  • 1950 से लगभग हर वर्ष भारत ने किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष/सरकार प्रमुख को मुख्य अतिथि आमंत्रित किया है (कुछ अपवादों को छोड़कर)।
  • अतिथि का चयन प्रायः कूटनीतिक संकेत देता है, जैसे: रणनीतिक साझेदारी (उदाहरण: फ्रांस का बार-बार आमंत्रण) क्षेत्रीय फोकस (2018 में आसियान देशों के नेता) राजनीतिक पुनर्संतुलन (1955 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्ज़ा—उस समय के सीमित सौहार्द के दौर में)

अपवाद:

  • 1966 और 1972 में राजनीतिक अस्थिरता और युद्धोत्तर परिस्थितियों के कारण कोई मुख्य अतिथि नहीं था।
  • 2021 में कोविड-19 के कारण कोई विदेशी मुख्य अतिथि नहीं आया।

स्रोत: विदेश मंत्रालय (MEA) रिकॉर्ड; जे.एन. दीक्षित की पुस्तक “India’s Foreign Policy”


4. पहले मुख्य अतिथि के रूप में इंडोनेशिया का चयन संयोग नहीं था

  • 1950 में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो पहले गणतंत्र दिवस मुख्य अतिथि बने।
  • यह चयन दर्शाता था: औपनिवेशिक-विरोधी एकजुटता एशियाई एकता नव-स्वतंत्र देशों में भारत की नेतृत्वकारी भूमिका

यही भावना आगे चलकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन (1961) की आधारशिला बनी।


5. “बीटिंग द रिट्रीट” मूलतः भारतीय परंपरा नहीं थी

  • बीटिंग द रिट्रीट (29 जनवरी) की परंपरा 17वीं सदी की यूरोपीय सैन्य प्रथा से आई—जिसका उद्देश्य सूर्यास्त पर सैनिकों को बैरकों में लौटने का संकेत देना था।
  • भारत ने इसे शहनाई, तबला, संतूर जैसे भारतीय वाद्ययंत्रों और देशज धुनों के साथ अपनाया।
  • हाल के वर्षों में औपनिवेशिक धुनों को हटाकर भारतीय देशभक्ति संगीत को प्राथमिकता दी गई है।

यह एक धीमी लेकिन सोच-समझकर की गई औपनिवेशिक विरासत से मुक्ति का उदाहरण है।


6. झांकियों का चयन अत्यंत प्रतिस्पर्धी (और राजनीतिक) होता है

  • राज्यों और मंत्रालयों को महीनों पहले विस्तृत प्रस्ताव जमा करने होते हैं।
  • मूल्यांकन के मानदंड: राष्ट्रीय प्रासंगिकता सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व दृश्यात्मक कथा-वाचन
  • कुछ राज्यों ने बहिष्करण पर सार्वजनिक विरोध भी किया है—क्षेत्रीय असंतुलन या पक्षपात के आरोप लगाते हुए।

यह दर्शाता है कि परेड केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि संघीय और राजनीतिक मंच भी है।


7. मोटरसाइकिल पिरामिड ने कभी विदेशी मेहमानों को चकित किया

  • सेना और पुलिस की “डेयरडेविल्स” मोटरसाइकिल प्रस्तुति—चलती बाइकों पर मानव पिरामिड—अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद चर्चित रही।
  • शीतयुद्ध काल में विदेशी मीडिया ने इसे भारतीय अनुशासन और साहस के प्रतीक के रूप में दिखाया।
  • हाल के वर्षों में सुरक्षा कारणों से इसे सीमित किया गया है।

8. महिलाओं की भागीदारी अचानक नहीं, क्रमिक रूप से बढ़ी

  • प्रारंभिक वर्षों में महिलाएँ बैंड और मेडिकल कोर में थीं, पर लड़ाकू और कमांड भूमिकाओं में उनकी उपस्थिति धीरे-धीरे बढ़ी।
  • उल्लेखनीय पड़ाव: पूर्ण महिला टुकड़ियाँ फ्लाईपास्ट का नेतृत्व करती महिला फाइटर पायलट
  • ये बदलाव दशकों की नीतिगत प्रगति का परिणाम हैं, किसी एक फैसले का नहीं।

9. फ्लाईपास्ट दुनिया के सबसे जटिल आयोजनों में से एक है

  • वायुसेना का फ्लाईपास्ट दर्जनों विमानों, सटीक समय-निर्धारण और घनी शहरी सीमा में समन्वय मांगता है।
  • मौसम, दृश्यता और प्रदूषण स्तर—अंतिम क्षणों में भी—कार्यक्रम बदल या रद्द करा सकते हैं।
  • पूर्व वायुसेना अधिकारियों के अनुसार, यह वैश्विक स्तर पर सबसे चुनौतीपूर्ण औपचारिक फ्लाईपास्ट में गिना जाता है।

10. गणतंत्र दिवस स्वतंत्रता से अधिक संविधान का उत्सव है

यह स्पष्ट होते हुए भी अक्सर भूल जाता है:

  • 26 जनवरी ब्रिटिश शासन से मुक्ति का नहीं, बल्कि संविधान के प्रवर्तन (1950) का दिवस है।
  • परेड का मूल संदेश: सैन्य पर नागरिक सत्ता की सर्वोच्चता संवैधानिक संप्रभुता विविधता में एकता

इसी कारण राष्ट्रपति, न कि प्रधानमंत्री, सलामी लेते हैं।


निष्कर्ष यह है कि

समय के साथ गणतंत्र दिवस परेड का स्वर बदला है—

  • दृढ़ता → प्रतिनिधित्व → आत्ममंथन

अस्तित्व सिद्ध करने से लेकर विविधता दिखाने और अब अपनी कहानी पर पुनर्विचार तक।

विभाजन की राजनीति पर सर्वोच्च न्यायालय का प्रहार — यूजीसी रेग्युलेशन 2026 पर रोक

 


विभाजन की राजनीति पर सर्वोच्च न्यायालय का प्रहार — यूजीसी रेग्युलेशन 2026 पर रोक || शिक्षा का जातिकरण नहीं, समावेशन चाहिए || समानता का उद्देश्य समाज को जोड़ना है, न कि शिक्षा संस्थानों को जातिगत प्रयोगशाला बनाना।


सुप्रीम कोर्ट द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के इक्विटी रेग्युलेशन 2026 पर लगाई गई रोक को केवल एक कानूनी या प्रशासनिक निर्णय के रूप में देखना इसकी गंभीरता को कम करके आंकना होगा। यह निर्णय उस समय आया है, जब शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के नाम पर सामाजिक विभाजन को संस्थागत रूप देने का प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा था।

न्यायालय ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए कहा कि नए नियम प्रथम दृष्टया अस्पष्ट हैं, इनके दुरुपयोग की आशंका है और इन्हें तत्काल लागू करना न तो व्यावहारिक है और न ही सामाजिक दृष्टि से उचित। यह टिप्पणी अपने आप में नीति-निर्माण की प्रक्रिया, उसकी मंशा और उसके संभावित दुष्परिणामों पर गंभीर प्रश्न उठाती है।

प्रसन्नता की बात है कि लंबे समय बाद सर्वोच्च न्यायालय से ऐसा निर्णय सामने आया है जिसने यह भरोसा पुनः जगाया है कि संवैधानिक संस्थाएँ अभी भी सामाजिक संतुलन और राष्ट्रीय एकता के प्रश्नों पर सजग हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने जिस स्पष्टता और संवेदनशीलता के साथ इस मामले को देखा, वह प्रशंसनीय है। यदि इस स्तर पर हस्तक्षेप नहीं होता, तो यह रेग्युलेशन उच्च शिक्षण संस्थानों को जातिगत तनाव और अविश्वास का केंद्र बना सकता था। इतिहास गवाह है कि शिक्षा संस्थानों में सामाजिक प्रयोगों की कीमत सबसे पहले युवा पीढ़ी को चुकानी पड़ती है।

“क्या हम पीछे लौट रहे हैं?” पीठ द्वारा सरकार से पूछा गया प्रश्न—

“जब हम जातिविहीन समाज की ओर बढ़ रहे थे, तो क्या अब पीछे लौटने का प्रयास हो रहा है?”

केवल एक संवैधानिक सवाल नहीं है, बल्कि यह उस दिशा पर सीधा प्रहार है, जिस ओर सामाजिक नीतियों को मोड़ा जा रहा है। सरकार की ओर से इस प्रश्न का कोई स्पष्ट उत्तर सामने नहीं आया। यह चुप्पी स्वयं बहुत कुछ कहती है।

भेदभाव की व्यापकता पर संकीर्ण सोच : सुप्रीम कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि भेदभाव केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या पिछड़ा वर्ग तक सीमित नहीं है। भेदभाव क्षेत्रीय हो सकता है, आर्थिक हो सकता है, संस्थागत रैगिंग के रूप में हो सकता है। भारत जैसे विविध सामाजिक ढाँचे वाले देश में भेदभाव को केवल जाति के चश्मे से देखना न तो व्यावहारिक है और न ही न्याय संगत।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि एक ही जाति एक राज्य में पिछड़ी हो सकती है और दूसरे में सामान्य वर्ग में आती है। ऐसे में अखिल भारतीय स्तर पर जाति-आधारित नियम लागू करना सामाजिक भ्रम और टकराव को जन्म दे सकता है। अलग-अलग जातियों के लिए अलग हॉस्टल बनाने जैसे प्रस्ताव पर अदालत की टिप्पणी— “भगवान के लिए, ऐसा मत कीजिए!” न केवल न्यायिक विवेक का परिचायक है, बल्कि यह भारत की साझा सामाजिक चेतना की रक्षा में दिया गया एक स्पष्ट संदेश भी है।

2012 के नियम बनाम 2026 का प्रयोग : न्यायालय का यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक है कि जब 2012 के नियम पहले से मौजूद थे और कार्यरत थे, तो नए नियमों की आवश्यकता क्यों पड़ी? यह प्रश्न सरकार की मंशा पर स्वाभाविक संदेह पैदा करता है।

2012 के नियमों की विशेषता यह थी कि शिकायतकर्ता की पहचान उजागर करना अनिवार्य था, समिति के सदस्य आंतरिक और अकादमिक होते थे, भेदभाव की परिभाषा स्पष्ट थी, प्रक्रिया न्यायिक और सुधारात्मक थी। इसके विपरीत, 2026 के रेग्युलेशन में गुमनाम शिकायतों का प्रावधान, बाहरी हस्तक्षेप और पुलिस कार्रवाई की संभावना, अस्पष्ट और जाति-केंद्रित परिभाषाएँ, दंडात्मक और प्रशासनिक प्रक्रिया है. ऐसी व्यवस्था में व्यक्तिगत विद्वेष, ईर्ष्या या वैचारिक असहमति को हथियार बनाकर किसी छात्र या शिक्षक का भविष्य प्रभावित किया जा सकता था।

“जन्मजात अपराधी” की अवधारणा : नए नियमों की संरचना से ऐसा प्रतीत होता है मानो तथाकथित सवर्ण जातियों में जन्म लेना ही एक अपराध हो। आज सामान्य वर्ग में मुख्यतः ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जातियाँ ही बची हैं, और इनमें से एक बड़ी आबादी आर्थिक रूप से अत्यंत विपन्न है। इन वर्गों को न आरक्षण मिलता है, न सरकारी सहायता, न राजनीतिक संरक्षण. इसके बावजूद, उच्च शिक्षण संस्थानों में पहुँचने वाले मेधावी छात्रों को अक्सर जातिगत पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ता है। यदि समानता के नाम पर बनाई गई नीतियाँ ही उन्हें पूर्व-घोषित दोषी मानने लगें, तो इससे अधिक विडंबना और क्या हो सकती है?

इसका एक परिणाम यह भी है कि आर्थिक रूप से सक्षम परिवार अपने बच्चों को विदेश भेज रहे हैं और उनमें से बड़ी संख्या वापस नहीं लौट रही। जो सक्षम नहीं हैं, वे भी कर्ज लेकर, संपत्ति बेचकर यही प्रयास कर रहे हैं। यह प्रवृत्ति केवल ब्रेन ड्रेन नहीं, बल्कि सामाजिक अविश्वास का संकेत है।

भाजपा सामाजिक एकता और राष्ट्रवाद की बात करती रही है। ऐसे में शिक्षा के क्षेत्र में जातिगत विभाजन की आशंका पैदा करने वाले नियम लाया जाना स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करता है। इतिहास बताता है कि जाति-आधारित राजनीति अल्पकालिक लाभ तो दे सकती है, लेकिन दीर्घकाल में यह राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर नुकसानदायक होती है।

भाजपा और मंडल का सबक : सत्ता में बने रहने की लालसा में भाजपा सरकार अपने घोषित सामाजिक उत्तरदायित्व भूलती दिख रही है। अगड़ों-पिछड़ों की राजनीति में उलझकर वह वही गलती दोहरा रही है, जो कभी विश्वनाथ प्रताप सिंह ने की थी। मंडल का मसीहा बनने का सपना उन्हें सत्ता से नहीं, बल्कि इतिहास से गायब कर गया।

भाजपा को “पुनः मूषक भव” की स्थिति से बचना चाहिए।

वोकिज़्म और विदेशी एजेंडा : यूजीसी के ये नियम 1871 के क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट की याद दिलाते हैं, जिसमें पूरी जातियों को जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया गया था। दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के बाद भी नेहरू सरकार ने इस कानून को लंबे समय तक बनाए रखा। आज वही मानसिकता नए शब्दों, नए नारों और “समानता” के नाम पर लौट रही है।

2023 में अमेरिका के कैलिफोर्निया में जाति-भेदभाव विरोधी कानून लाया गया — एक ऐसे समाज में जहाँ जाति व्यवस्था अस्तित्व में ही नहीं है। यह कानून मूलतः भारतीय मूल के कर्मचारियों, विशेषकर हिन्दुओं, को लक्ष्य करता है। इसके अनुसार कंपनियों पर यह ज़िम्मेदारी है कि वे भेदभाव विरोधी नीति में जाति को भी शामिल करें और शिकायत तंत्र विकसित करें । इस क़ानून में दोष सिद्ध होने पर दोषी कर्मचारी और कंपनी पर भारी आर्थिक जुर्माना, पीड़ित को मुआवज़ा तथा कंपनी के खिलाफ कार्यवाही का प्रावधान हैं । बाद में इस तरह का कानून सिएटल शहर में लागू हुआ । इसके पीछे भारत और हिन्दू विरोधी लॉबी का हाथ है । इस कानून के अंतर्गत झूठी या मामूली शिकायतों के आधार पर कड़ी कार्यवाही की गयी, कंपनियों पर भारी जुर्माना लगाया गया, कथित दोषी सवर्ण कर्मचारियों को नौकरी से निकाला गया और भारत प्रत्यर्पित किया. इसका परिणाम यह हुआ कि बाद में कम्पनियों ने सवर्ण भारतीय कर्मचारियों को नौकरी देना ही बंद कर दिया.

यह आशंका निराधार नहीं कि वही वैचारिक एजेंडा भारत में भी लागू करने का प्रयास किया जा रहा है—और दुर्भाग्य से हमारी सरकार अपने वोक-प्रभावित नौकरशाहों पर अत्यधिक निर्भर हो चुकी है ।

शिक्षा मंत्रालय भाजपा सरकार का एक उपेक्षित संस्थान है जो वर्षों से दिशाहीन प्रतीत होता है। पाठ्यक्रम से लेकर पुस्तकों तक, सब कुछ वही है जो कांग्रेस-काल में वामपंथी विचारधारा के प्रभाव में तैयार किया गया था। मजे की बात है कि यूजीसी के ये नए नियम बनाने में प्रमुखता से लगे रहे एक कथित शिक्षाविद को सरकार ने इसी वर्ष पद्मश्री से सम्मानित किया है ।

आम धारणा है कि विपक्षी दल तो जातिगत और तुष्टिकरण की राजनीति में डूबे हैं इसलिए वे तो नए नियमों के समर्थक है लेकिन भाजपा की चुप्पी आश्चर्यजनक है. वामपंथियों के शुभचिन्तक बताये जा रहे शिक्षामंत्री द्वारा प्रदर्शनकारियों को दिया गया आश्वासन कि उनके साथ अन्याय नहीं होने दिया जायेगा, यह दर्शाता है मानो वे स्थायी शिक्षा मंत्री हों और सरकार शाश्वत। लोकतंत्र में ऐसा अहंकार घातक होता है।

सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय केवल रोक नहीं, बल्कि एक सामयिक चेतावनी है—कि सुधार आवश्यक हैं, लेकिन वे समाज को जोड़ने वाले हों, तोड़ने वाले नहीं।

अब भी समय है कि सरकार आत्ममंथन करे, नीति-निर्माण में व्यापक सामाजिक परामर्श को स्थान दे और शिक्षा को वैचारिक प्रयोगशाला बनने से बचाए।

यदि समानता, न्याय और संवाद के साथ आगे बढ़ा गया, तो न केवल शिक्षा व्यवस्था मजबूत होगी, बल्कि भारतीय समाज की वह आंतरिक एकता भी अक्षुण्ण रह सकेगी, जो इस देश की सबसे बड़ी ताकत रही है।

भूल स्वीकार कर भूल सुधारी जा सकती है। इतिहास गवाह है—पुनर्जागरण के पथ पर अग्रसर समाज किसी को माफ़ नहीं करता। जिन्ना की मजार पर दिए गए एक बयान ने लालकृष्ण आडवाणी जैसे कद्दावर नेता की वर्षों की संचित हिंदुत्व की पूंजी को एक झटके से समाप्त कर दिया, यह बात मोदी जी को याद रखनी चाहिए, यद्दपि उन्होंने हिन्दू पुनर्जागरण में अत्यंत महत्त्व पूर्ण भूमिका निभाई है.

~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~