गणतंत्र दिवस परेड से जुड़ी कुछ चौंकाने वाली और कम-ज्ञात जानकारियाँ || परंपराएँ, मुख्य अतिथि, और समय के साथ हुए परिवर्तन ||
1. परेड हमेशा कर्तव्य पथ (राजपथ) पर नहीं होती थी
- 1950 से 1954 के बीच शुरुआती गणतंत्र दिवस परेड इरविन स्टेडियम (वर्तमान राष्ट्रीय स्टेडियम), किंग्सवे (राजपथ), लाल किला और रामलीला मैदान जैसे विभिन्न स्थलों पर आयोजित हुईं।
- राष्ट्रपति भवन से इंडिया गेट तक की आज की प्रतिष्ठित परेड-मार्ग परंपरा 1955 में जाकर स्थिर हुई।
- इसका प्रतीकात्मक अर्थ था—औपनिवेशिक समारोह-भूगोल से हटकर, राष्ट्रपति (राष्ट्र प्रमुख) और जनता के बीच प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करना।
स्रोत: रक्षा मंत्रालय प्रकाशन; द हिंदू, टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे अख़बारों के अभिलेख
2. पहला गणतंत्र दिवस अपेक्षाकृत सादा था
- 26 जनवरी 1950 को आज जैसी भव्य सैन्य शक्ति-प्रदर्शन नहीं थी।
- मुख्य केंद्र था—डॉ. राजेंद्र प्रसाद का राष्ट्रपति पद की शपथ ग्रहण।
- सांस्कृतिक झांकियाँ, फ्लाईपास्ट और विस्तृत प्रस्तुतियाँ 1960 के दशक के बाद धीरे-धीरे बढ़ीं।
यह विकास भारत के आत्मविश्वास के बढ़ने—सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्तर पर—का संकेत था।
3. मुख्य अतिथि की परंपरा रणनीतिक सोच से शुरू हुई
- 1950 से लगभग हर वर्ष भारत ने किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष/सरकार प्रमुख को मुख्य अतिथि आमंत्रित किया है (कुछ अपवादों को छोड़कर)।
- अतिथि का चयन प्रायः कूटनीतिक संकेत देता है, जैसे: रणनीतिक साझेदारी (उदाहरण: फ्रांस का बार-बार आमंत्रण) क्षेत्रीय फोकस (2018 में आसियान देशों के नेता) राजनीतिक पुनर्संतुलन (1955 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्ज़ा—उस समय के सीमित सौहार्द के दौर में)
अपवाद:
- 1966 और 1972 में राजनीतिक अस्थिरता और युद्धोत्तर परिस्थितियों के कारण कोई मुख्य अतिथि नहीं था।
- 2021 में कोविड-19 के कारण कोई विदेशी मुख्य अतिथि नहीं आया।
स्रोत: विदेश मंत्रालय (MEA) रिकॉर्ड; जे.एन. दीक्षित की पुस्तक “India’s Foreign Policy”
4. पहले मुख्य अतिथि के रूप में इंडोनेशिया का चयन संयोग नहीं था
- 1950 में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो पहले गणतंत्र दिवस मुख्य अतिथि बने।
- यह चयन दर्शाता था: औपनिवेशिक-विरोधी एकजुटता एशियाई एकता नव-स्वतंत्र देशों में भारत की नेतृत्वकारी भूमिका
यही भावना आगे चलकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन (1961) की आधारशिला बनी।
5. “बीटिंग द रिट्रीट” मूलतः भारतीय परंपरा नहीं थी
- बीटिंग द रिट्रीट (29 जनवरी) की परंपरा 17वीं सदी की यूरोपीय सैन्य प्रथा से आई—जिसका उद्देश्य सूर्यास्त पर सैनिकों को बैरकों में लौटने का संकेत देना था।
- भारत ने इसे शहनाई, तबला, संतूर जैसे भारतीय वाद्ययंत्रों और देशज धुनों के साथ अपनाया।
- हाल के वर्षों में औपनिवेशिक धुनों को हटाकर भारतीय देशभक्ति संगीत को प्राथमिकता दी गई है।
यह एक धीमी लेकिन सोच-समझकर की गई औपनिवेशिक विरासत से मुक्ति का उदाहरण है।
6. झांकियों का चयन अत्यंत प्रतिस्पर्धी (और राजनीतिक) होता है
- राज्यों और मंत्रालयों को महीनों पहले विस्तृत प्रस्ताव जमा करने होते हैं।
- मूल्यांकन के मानदंड: राष्ट्रीय प्रासंगिकता सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व दृश्यात्मक कथा-वाचन
- कुछ राज्यों ने बहिष्करण पर सार्वजनिक विरोध भी किया है—क्षेत्रीय असंतुलन या पक्षपात के आरोप लगाते हुए।
यह दर्शाता है कि परेड केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि संघीय और राजनीतिक मंच भी है।
7. मोटरसाइकिल पिरामिड ने कभी विदेशी मेहमानों को चकित किया
- सेना और पुलिस की “डेयरडेविल्स” मोटरसाइकिल प्रस्तुति—चलती बाइकों पर मानव पिरामिड—अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद चर्चित रही।
- शीतयुद्ध काल में विदेशी मीडिया ने इसे भारतीय अनुशासन और साहस के प्रतीक के रूप में दिखाया।
- हाल के वर्षों में सुरक्षा कारणों से इसे सीमित किया गया है।
8. महिलाओं की भागीदारी अचानक नहीं, क्रमिक रूप से बढ़ी
- प्रारंभिक वर्षों में महिलाएँ बैंड और मेडिकल कोर में थीं, पर लड़ाकू और कमांड भूमिकाओं में उनकी उपस्थिति धीरे-धीरे बढ़ी।
- उल्लेखनीय पड़ाव: पूर्ण महिला टुकड़ियाँ फ्लाईपास्ट का नेतृत्व करती महिला फाइटर पायलट
- ये बदलाव दशकों की नीतिगत प्रगति का परिणाम हैं, किसी एक फैसले का नहीं।
9. फ्लाईपास्ट दुनिया के सबसे जटिल आयोजनों में से एक है
- वायुसेना का फ्लाईपास्ट दर्जनों विमानों, सटीक समय-निर्धारण और घनी शहरी सीमा में समन्वय मांगता है।
- मौसम, दृश्यता और प्रदूषण स्तर—अंतिम क्षणों में भी—कार्यक्रम बदल या रद्द करा सकते हैं।
- पूर्व वायुसेना अधिकारियों के अनुसार, यह वैश्विक स्तर पर सबसे चुनौतीपूर्ण औपचारिक फ्लाईपास्ट में गिना जाता है।
10. गणतंत्र दिवस स्वतंत्रता से अधिक संविधान का उत्सव है
यह स्पष्ट होते हुए भी अक्सर भूल जाता है:
- 26 जनवरी ब्रिटिश शासन से मुक्ति का नहीं, बल्कि संविधान के प्रवर्तन (1950) का दिवस है।
- परेड का मूल संदेश: सैन्य पर नागरिक सत्ता की सर्वोच्चता संवैधानिक संप्रभुता विविधता में एकता
इसी कारण राष्ट्रपति, न कि प्रधानमंत्री, सलामी लेते हैं।
निष्कर्ष यह है कि
समय के साथ गणतंत्र दिवस परेड का स्वर बदला है—
- दृढ़ता → प्रतिनिधित्व → आत्ममंथन
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