राहुल गांधी : स्टार प्रचारक से बने मोदी के संकटमोचक || सेल्फ गोल एक्सपर्ट बन गए मोदी की ढाल
भारतीय लोकतंत्र की राजनीति जितनी गंभीर है, उतनी ही विडंबनाओं से भरी भी है। यहाँ कई बार नेता जिस उद्देश्य से कदम उठाते हैं, उसका परिणाम ठीक उल्टा निकल आता है। रणनीति कुछ और होती है, असर कुछ और। पिछले एक दशक में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के संदर्भ में एक तंज बार-बार सुनाई देता रहा है—“वे भाजपा के सबसे बड़े स्टार प्रचारक हैं।” यह वाक्य सुनने में भले ही व्यंग्य लगे, लेकिन हाल की संसदीय घटनाओं ने इसे फिर से प्रासंगिक बना दिया है। संसद के बजट सत्र के दौरान जिस प्रकार मुद्दों का फोकस बदला और सरकार को राहत मिली, उसने यह प्रश्न खड़ा कर दिया कि क्या राहुल गांधी अनजाने में ही नरेंद्र मोदी के लिए संकटमोचक बनते जा रहे हैं?
असंतोष का उबाल और सरकार की मुश्किलें
उस समय देश का राजनीतिक वातावरण भाजपा के लिए बिल्कुल अनुकूल नहीं था। यूजीसी के नए नियमों ने विश्वविद्यालय परिसरों में उथल-पुथल मचा दी थी। छात्र, शोधार्थी और शिक्षक सड़क पर उतर आए थे। प्रदर्शन केवल कुछ महानगरों तक सीमित नहीं थे, बल्कि छोटे शहरों और कस्बों तक फैल चुके थे। सबसे चिंताजनक बात यह थी कि यह आंदोलन जाति या वर्ग की सीमाओं में बँटा हुआ नहीं था। सवर्ण से लेकर दलित, पिछड़े और आदिवासी—सभी वर्गों के छात्र इसमें शामिल थे।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यही वह स्थिति होती है, जो किसी भी सरकार के लिए सबसे खतरनाक मानी जाती है—जब असंतोष सर्वव्यापी हो जाए और उसके खिलाफ कोई स्पष्ट वैचारिक विभाजन न हो। भाजपा की परेशानी यह भी थी कि उसका पारंपरिक समर्थक युवा वर्ग भी इस बार नाराज दिखाई दे रहा था। जिन युवाओं ने सोशल मीडिया पर भाजपा की विचारधारा को मजबूती दी थी, वही अब सवाल पूछ रहे थे।
सोशल मीडिया, जो भाजपा की ताकत माना जाता था, वहाँ माहौल बदल गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाइव कार्यक्रमों में पहले लाखों लोग जुड़ते थे, लेकिन अब संख्या घटकर सैकड़ों या हजारों में सिमटने लगी। यह गिरावट केवल आँकड़ा नहीं थी, बल्कि संकेत था कि भावनात्मक समर्थन में दरार आ चुकी है।
सरकार दुविधा में थी—नियम वापस ले तो नीति विफल दिखे, लागू रखे तो आंदोलन बढ़े। यह वही स्थिति थी जिसे हिंदी मुहावरे में ‘साँप-छछूंदर’ कहा जाता है।
विपक्ष के लिए सुनहरा मौका
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में यह समय विपक्ष के लिए स्वर्णिम अवसर था। संसद का बजट सत्र सरकार को घेरने का आदर्श मंच हो सकता था। बेरोजगारी, शिक्षा, युवाओं की नाराजगी—ये सारे मुद्दे विपक्ष के पास थे। राहुल गांधी, जो नेता विपक्ष की भूमिका में थे, उनसे उम्मीद थी कि वे सरकार को कटघरे में खड़ा करेंगे।
लेकिन राजनीति में कभी-कभी सबसे बड़ा नुकसान ‘गलत समय पर गलत मुद्दा’ उठा देने से होता है।
मुद्दा बदला, बहस बदली, सरकार बची
धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलते हुए राहुल गांधी यूजीसी या बजट पर केंद्रित हमला कर सकते थे। लेकिन उन्होंने अप्रत्याशित रूप से सेना प्रमुख मुकुंद नरवणे की एक अप्रकाशित पुस्तक का उल्लेख करते हुए चीन सीमा का मुद्दा उठा दिया। रक्षा मंत्री और प्रधानमंत्री पर आरोप लगाए गए। यह विषय संवेदनशील अवश्य था, किंतु तत्कालीन जनभावना से सीधा जुड़ा हुआ नहीं था।
लोकसभा अध्यक्ष ने संसदीय परंपरा का हवाला देते हुए अप्रकाशित पुस्तक का उल्लेख करने से मना कर दिया। इसके बाद हंगामा शुरू हुआ। कांग्रेस ने इसे बड़ा मुद्दा बना दिया। सदन की कार्यवाही बाधित हुई। मीडिया और सोशल मीडिया पर बहस का केंद्र अचानक बदल गया।
यहीं भाजपा को राहत मिली।
राजनीति में इसे “एजेंडा सेटिंग” कहा जाता है—जो तय करता है कि चर्चा किस विषय पर होगी, वही बहस जीतता है। राहुल गांधी ने अनजाने में सरकार से एजेंडा छीनने के बजाय उसे खुद सौंप दिया।
विवादों की नई श्रृंखला
इसके बाद रवनीत सिंह बिट्टू को ‘गद्दार’ कहे जाने की घटना ने सिख समुदाय में नाराजगी पैदा कर दी। भाजपा ने इसे तुरंत राजनीतिक मुद्दा बनाया। कांग्रेस को सफाई देनी पड़ी।
इसके साथ ही भाजपा ने रणनीतिक जवाबी हमला किया। सांसद निशिकांत दुबे ने इतिहास और पुस्तकों का सहारा लेते हुए नेहरू-गांधी परिवार से जुड़े विवादास्पद प्रसंग उठाए। ‘पुस्तक युद्ध’ शुरू हो गया।
अब बहस यूजीसी से हटकर इतिहास, संस्मरण और निजी जीवन के आरोप-प्रत्यारोप पर आ गई।
पुस्तकों का संदर्भ और उनका सार
इस विवाद में जिन पुस्तकों का उल्लेख हुआ, उनका राजनीतिक महत्व समझना जरूरी है:
‘एडविना एंड नेहरू’ (कैथरीन क्लेमेंट)
यह पुस्तक नेहरू और एडविना माउंटबेटन के निजी संबंधों पर आधारित है। इसमें भारत विभाजन के समय की राजनीतिक और व्यक्तिगत जटिलताओं का वर्णन है। भाजपा ने इसे एडविना -नेहरू के अंतरंग संबंधों और उनकी निर्णय क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगाने के लिए उद्धृत किया।
‘इंडिया रिमेम्बर्ड’ (पामेला माउंटबेटन)
यह संस्मरण सत्ता हस्तांतरण के दौर का प्रत्यक्षदर्शी विवरण है। इसमें नेहरू परिवार के निजी संबंधों और उस दौर की राजनीतिक परिस्थितियों का उल्लेख मिलता है।
‘द रेमिनिसेंस ऑफ नेहरू एरा’ (एम.ओ. मथाई)
नेहरू के निजी सचिव द्वारा लिखी गई इस पुस्तक में नेहरू युग के कई अंदरूनी किस्सों का जिक्र है। इसमें सत्ता के भीतर की राजनीति और व्यक्तिगत संबंधों के विवादास्पद विवरण दिए गए हैं।
‘हिमालयन ब्लंडर’ (ब्रिगेडियर जॉन डालवी)
1962 के भारत-चीन युद्ध की असफलताओं पर आधारित यह पुस्तक राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व की रणनीतिक गलतियों का विश्लेषण करती है। इसमें तत्कालीन सरकार की तैयारी की कमी की आलोचना है।
‘मित्रोखिन आर्काइव’
शीत युद्ध काल के दस्तावेजों पर आधारित यह संग्रह सोवियत प्रभाव और भारतीय राजनीति के संबंधों पर दावे करता है। भाजपा ने इसे कांग्रेस की विदेश नीति पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल किया।
इन पुस्तकों के उद्धरणों ने कांग्रेस को रक्षात्मक बना दिया। परिणामस्वरूप, वह सरकार पर हमला करने के बजाय खुद बचाव करती नजर आई।
राजनीतिक मनोविज्ञान की दृष्टि से
राजनीति केवल तथ्यों की लड़ाई नहीं होती, बल्कि धारणा (perception) की लड़ाई होती है। जनता वही याद रखती है, जो सुर्खियों में रहता है। जब यूजीसी मुद्दा मीडिया से गायब हुआ, तो सरकार पर बना दबाव भी स्वतः कम हो गया।
यह वही सिद्धांत है जिसे चुनावी रणनीतिकार कहते हैं—
“जब विपक्ष अपने मुद्दे छोड़कर आपके मुद्दों पर बहस करने लगे, समझिए आपने आधी लड़ाई जीत ली।”
यही यहाँ हुआ।
निष्कर्ष: विरोध या मदद?
राहुल गांधी की मंशा क्या थी, यह अलग प्रश्न है। लेकिन राजनीति में इरादा नहीं, परिणाम मायने रखता है। परिणाम यह रहा कि:
- सरकार रक्षात्मक से आक्रामक हुई
- कांग्रेस आक्रामक से रक्षात्मक हुई
- छात्र आंदोलन हाशिये पर चला गया
- मीडिया का फोकस बदल गया
इस दृष्टि से देखें तो राहुल गांधी ने अनजाने में भाजपा को वह राहत दे दी, जिसकी उसे सबसे ज्यादा जरूरत थी।
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